मेरे द्वार पर मरघट बनवा दो . .
मंदिर बनवा कर क्या
मिलेगा
इस मन की ये दवा नहीं . .
जीवन भर माँगा है हाथ
पसारे
अब बची कोई दुआ नहीं . .
कुछ करना ही है मेरे खातिर
तो बस इतना ही कर दो अब
. .
सच्चाई को बता सके इसीलिए
मेरे प्यारे इक गीता
दिलवा दो . .
और असत्य को देख सकूँ
इसीलिए
मेरे द्वारे मरघट बनवा दो
. . .!!!