Tuesday, April 29, 2014

वो बूढी दादी


वो बूढी दादी
उस शव के पीछे चलने वाला
कोई  शख्स  न  रो रहा था ,
पर  ये  आंसू  किसके थे
जब कोई न कुछ खो रहा था .

जब पीछे मुड़ कर देखा
तो उसका आँगन रो रहा था ,
मैं समझ न सका की
ऐसा क्या था जो वो खो रहा था.

मैंने उस आँगन से कहा की
कभी ऐसा होता तो नहीं,
किसी की याद मैं कोई
आँगन कभी रोता तो नहीं.

वैसे भी उसका कोई न था
बरसो से अकेली रहती थी ,
तेरी ममता उसपर क्यों जागी
जब किसी से कुछ न कहती थी.

मैंने देखा है की उसने कई
शामों से तुझे रोशन न किया ,
इस  घर  के चरागों  को
कभी   पोषण  न  दिया .

वो यहाँ रहने वाली भी
तो कुछ खास न थी ,
वो एकांकी बूढी दादी उसे
जीवा  से  आस न थी .

अक्सर वो रह के मुस्फिरों को
गिन गिन अपना दिन बिताती,
वो हर आने वाले को देख
न  जाने  क्यों  मुस्काती.

उसके रहते तो कभी ये
आँगन महका न था ,
कई वर्षों से हसीं
के ठहाकों से चेह्का न था.

फिर आँगन बोला चुप होजा
उसके हांथो ने मुझे बनाया था,
हर पल अपने बच्चों जैसा
उसने मुझे सजाया था .

उस रोज उसके होने से
घर की मिटटी भी महका करती,
इस आँगन की रोनक मैं
तितली भी चेह्का करती.

जब सपनों से डरकर रातों मैं
उसका मुन्ना रोया करता ,
तब उसकी मीठी लोरी मैं
ये घर भी सोया करता .

तब उसकी  रूह  से  इस
घर मैं हजारों दिए जलते थे ,
उसकी ममता की छाओं मैं
इस घरके कत्तरे -२ पलते थे.

ममता की डोर से बंधी वो
लो हर पल जलती थी  ,
पर वो मोम सी किसी को न
दिखी जो कतरा -२ पेघलती थी.

इक दिन ऐसा भी आया जब
सबने उसको  छोड़ दिया ,
उस  बुझती  लो  से
अपना  मुख  मोड़ लिया .

उसकी एकाकी दुनिया में अब
उसका कोई न  साथी था  ,
रोई  वो  इतना  थी की
अब आंसू भी न बाकी था .

अकसरे उसके चेहरे पर दीखता
हसी का जो स्पंदन था ,
पर  सच तो  किसी को न
दिखा वो बिन आसूं क्रंदन था........

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